Monday, 21 November 2011

मुक्तक खण्ड

मुक्तक खण्ड


सुख दुख का ताप सहन करना ही जीवन की परिभाषा है
दुख दर्द बाँट लूँ औरों का मेरे मन की अभिलाषा है
छल दम्भ ढोंग भ्रम विकृत अहिंसा का मैं घोर विरोधी हूँ
जिसका अनुरागी मैं वह सत्पथ संघर्षों की भाषा है          ॥


धीरे धीरे चमन इश्क का बियाबान हो जायेगा
जीवन के मसलों का यूँ ही समाधान हो जायेगा
अपने आतंकी यौवन को यूँ मत लेकर चला करो
वरना ये ‍"घायल" दिल अपना मुसलमान हो जायेगा      ॥


मुझे कामिल नहीं समझो न फ़ित्रत आशिकी करना
नहीं सीखा किसी से मैंने हुनरे खुदकशी करना
कहो तो बन्द कर दूँ कोशिशे नाकाम को फ़ौरन
अगर अच्छा नहीं लगता है मेरा दिल्लगी करना       ॥


सद्भावों सत्कर्मों का आभरण देखता हूँ
रूप ही नहीं निर्मल अन्तःकरण देखता हूँ
पावन मन होगा तो मेरी दृष्टि समझ पाओगे
मैं लोगों के चरण नहीं आचरण देखता हूँ                ॥


अब तलक का है मेरा तज़ुर्बा यही
ज़ख्मे दिल को दिखाना नहीं चाहिए
मुझसे कहते हैं वो आप घायल हैं तो
आप को मुस्कराना नहीं चाहिए                              ॥


फिर कोई गोलमाल कर देना
तुम खुदा को निहाल कर देना
तुम्हें शवाब मिलेगा जानम
कोई काफ़िर हलाल कर देना                                    ॥


आँख क्यों लाल लाल करता है
बेवज़ह क्यों मलाल करता है
वो खुदादोस्त नहीं कातिल है
काफ़िरों को हलाल करता है                                      ॥


अपना दामन छुडा कर चले जाइए
मेरे दिल को जला कर चले जाइए
इस ज़माने में हर बेवफ़ा की तरह
आप भी मुसकराकर चले जाइए                    ॥


किसी के हाथ में खुद सागर ओ मीना नहीं आता
शराबे हुस्न आँखों से जिसे पीना नहीं आता
जो घुट घुट करके साकी की अदा देखा किए तरसे
उसे मरना नहीं आता उसे जीना नहीं आता     ॥


अब फिर भविष्य में नहीं वो काम करेंगे
खाके मलाई रबडी आराम करेंगे
हम क्यों चलें बनाने मन्दिर या शिवाला
ये रामजी का काम है ये राम करेंगे     ॥


बाबर के वंशज क्यों महान हो गए
हँसते हुए उपवन क्यों वीरान हो गए
जिनको था देश प्यारा वे बलिदान हो गए
जिनको था शीश प्यारा मुसलमान हो गए   ॥


हर तरफ़ चीख है ये शोर शराबा जाए
कुछ करो बन्द हो ये ख़ून ख़राबा जाए
जिसको है प्यार मेरे देश से वो रहले यहाँ
वरना वो रोम मदीने को या काबा जाए    ॥


देश की आन बान कैसे रहे
शायरी बेज़ुबान कैसे रहे
वो ख़ुदायार और हम क़ाफ़िर
साथ गीता क़ुरान कैसे रहे         ॥


धर्म या जाति का मत भरम कीजिए
देश के हाल पर कुछ शरम कीजिए
खूँ नहीं चाहिए माँ का वंदन करो
सिर्फ़ इतना ही हमपे क़रम कीजिए    ॥


कौन है किसकी ये हिचकियाँ देखिए
मातृभू ले रही सिसकियाँ देखिए
एक दिन अपना साया हटा लेंगी हम
कुछ लताओं की ये धमकियाँ देखिए    ॥


हम लुत्फ़े ग़म हैं दर्द की आवाज़ नहीं हैं
अंजाम भी हैं हम फ़क़त आग़ाज़ नहीं हैं
हर वक़्त के जबीं पे इबारत है हमारी
हम वक़्त के इतिहास के मोहताज़ नहीं हैं     ॥


पहले घर में दिया जला देना
आग चुपके से फिर लगा देना
जब मेरी आह कान तक पहुँचे
आप धीरे से मुसकरा देना               ॥


इस दर पे जो आते हैं इनाआम ये पाते हैं
रोते हुए आते हैं हँसते हुए जाते हैं
आओ चलें फ़न अपना दुनिया को दिखाते हैं
तुम आग लगाते हो हम आग बुझाते हैं      ॥


दुख दर्द प्यार इज़्ज़त जज़्बात नहीं माने
समझाओ चाहे जितना हालात नहीं माने
रिश्ते सबूत इनकी देते रहो दुहाई
जो लात का है आदी वो बात नहीं माने   ॥


उसके मगर के आँसू झूठे सभी वादे हैं
ओसामा बिन लादेन को जो पीठ पे लादे हैं
जो बन गया है सरी दुनिया के लिए ख़तरा
है नाम पाक उसका नापाक इरादे हैं         ॥


हसरत है मेरी आप ख़ूब नाम कीजिए
लेकिन किसी को यूँ मत बदनाम कीजिए
शोहरत मिलेगी आपको ये काम कीजिए
बस क़त्ल आशिक़ों का सरेआम कीजिए    ॥


लग रही तुम गज़ल की तरह
दिल मेरा है कमल की तरह
शीश पे तुमको मैं धार लूँ
यदि लगो गंगाजल की तरह    ॥


कुछ खेल प्रेमियों को झाबर लगे अच्छा
कुछ तेल प्रेमियों को डाबर लगे अच्छा
करते हैं जो सियासत मज़हब के नाम पे
उन देशद्रोहियों को बाबर लगे अच्छा       ॥


गाँधी तेरी विकृत अहिंसा का जवाब लिख जाऊँगा
बूढ़े भारत के माथे पर मैं शबाब लिख जाऊँगा
इसी सदी में इसी क़लम से मैं ये वादा करता हूँ
बच्चे बच्चे की ज़बान पे इन्कलाब लिख जाऊँगा   ॥


क्या पता कब मिले कब जुदा हो गए
लोग कहते हैं अब वो ख़ुदा हो गए
आजकल सात पर्दों में रहते हैं वो
जो सियासत से शादीशुदा हो गए   ॥


जिनको हम अपने दिल का मेहमान समझते हैं
वो लोग हमें केवल दरवान समझते हैं
हमको पता है किसने लूटा है घर हमारा
’घायल’ वो हमें ग़ाफ़िल नादान समझते हैं ॥


अपने पहलू में सुख़न अशआर लेकर घूमते हैं
हम हैं ’घायल’ इक दिले बीमार लेकर घूमते हैं
हम अगर इक इश्क़ का संसार लेकर घूमते हैं
आप भी तो हुस्न का बाज़ार लेकर घूमते हैं ॥


बड़े नमाज़ी खेल इश्क़ का करते खुल्लमखुल्ला जी
खुला खेल फ़र्रुखाबादी खेल रहे हैं मुल्ला जी
जिनके घर पानी भी पीना कहते हैं हराम होगा
रोज़ा अफ़्तारी में जाकर खा आए रसगुल्ला जी ॥


सारी दुनिया जाग रही है फिर मैं कैसे सो जाऊँ
दुआ करो जीवन का बोझा धीरे धीरे धो जाऊँ
मेरे बच्चे नौजवान बेरोज़गार लाचार हुए
फिर मैं ऐसे कैसे इतनी जल्दी बूढ़ा हो जाऊँ  ॥


ये मेरा वतन जंग के मैदां से कम नहीं
कुछ लोग यहाँ हाथ में तलवार लिए हैं
लगते हैं बदसलूक बड़े नाव के माझी
नादान हैं जो हाथ में पतवार लिए हैं ॥


बीती निशा विहान हो रहा ये विश्वास करो
मैं कहता हूँ सूरज नया निकलने वाला है
जिसको अपने आदि अंत का कोई पता नहीं
वो कहता है देश का सूरज ढलने वाला है ॥


हर एक हमसफ़र जानेजिगर नहीं होता
इसलिए मेरा कोई हमसफ़र नहीं होता
हम भी कुछ आप के मानिंद चुप रहे होते
हमारा रहबर गर बेख़बर नहीं होता ॥


जनम जनम का साथ निभाने का दम भरते बहुत मगर
मेरे साथ चलेगा कोई अंगारों की बस्ती में
शान्ति खोजना है तुमको तो जाओ किसी हिमालय पर
शान्ति यहाँ पर व्यर्थ खोजते तलवारों की बस्ती में ॥


खुला रखते दरो दिल दोस्त से पर्दा नहीं करते
न पूरा कर सकें ऐसा कोई वादा नहीं करते
लगी हो आग ग़ुलशन में दरख़्तों पे क़हर बरपा
हम ऐसे वक़्त हुस्नो इश्क़ की चर्चा नहीं करते  ॥