बहुत बड़ा वाज़िब सवाल क्यों मन के अंदर नहीं उठा ।
कोई मुस्लिम क्यो अब तक मज़हब से ऊपर नहीं उठा ।।
या ज़मीर गिरवी रख दी या आत्मा को ही बेंच दिया ।
तेरे मन का क्यों सोता है अब तक दिनकर नहीं उठा ।।
मस्जिद मकतब या ज़मात जेहादी मरकज़ बन बैठे ।
इनकी कभी मज़म्मत को क्यो कोई शायर नहीं उठा ।।
अहंकार की मदिरा का उसने छककर मदपान किया ।
वो नास्तिक अब भी सोता है देखो पीकर नहीं उठा ।।
फूँक मारकर जलते दीपक उसे बुझाना आता है ।
इस दीवाली से जलकर भारत का जोकर नहीं उठा ।।